रिसर्च पेपर · RP37

बीमार नहीं हैं तो लक्षण घटेंगे नहीं: AI कोच का असर g = 0.07

Background. पुरानी पूल स्टडीज़ कहती हैं कि चैटबॉट मिले-जुले ग्रुप में डिप्रेशन के लक्षण घटाते हैं (g = 0.31)। जो लोग बीमार नहीं हैं, उनमें यही असर g = 0.07 है। सवाल यह है। क्या वही एजेंट तबीयत, स्किल और आदत भी बढ़ाते हैं? Methods. यह PRISMA-2020 सिस्टमैटिक रिव्यू है। साथ में रैंडम-इफ़ेक्ट्स मेटा-एनालिसिस है। RCT (ऐसी स्टडी जिसमें लोगों को लॉटरी की तरह दो ग्रुप में बांटा जाता है) और कंट्रोल्ड ट्रायल देखे गए। साल 2017 से 22 September 2026 तक। स्टडी में वही लोग आए जो बीमार नहीं थे। एजेंट नियम-आधारित या जेनेरेटिव था। काम तबीयत सुधारना था। नतीजे थे तबीयत, अच्छा मूड, स्किल इस्तेमाल, आदत बदलना और ऐप पर टिकना। सर्च हुई PubMed, PsycINFO, Scopus, Web of Science, Google Scholar, CTRI, ClinicalTrials.gov और OSF preprints पर। असर नापा Hedges g (असर कितना बड़ा है, इसका नाप) से। मॉडल REML था। पक्केपन का ग्रेड GRADE से हुआ। पक्षपात का खतरा RoB 2 से नापा गया। Results. सिर्फ़ तबीयत के स्केल पर तीन ट्रायल थे। N = 1,658। पूल असर g = 0.07 था (95% CI −0.06 to 0.19)। एक और ट्रायल ने अच्छा मूड नापा। चार ट्रायल मिलकर N = 2,144 हो गए। असर g = 0.17 हो गया (95% CI −0.01 to 0.35; I² = 68%; tau² = 0.022; 95% prediction interval −0.40 to 0.73)। दोनों अंतराल शून्य को छूते हैं या शून्य के पास हैं। वेट-लिस्ट या आम देखभाल के मुकाबले असर g = 0.28 था (95% CI 0.14 to 0.42; I² = 0%)। अच्छे वेब रिसोर्स के मुकाबले असर g = 0.02 था (95% CI −0.10 to 0.14)। एक ट्रायल में खुद की देखभाल d = 0.36 थी, दस दिन पर। एक महीने बाद यह टिकी नहीं। इस्तेमाल कम था। सबसे बड़ी स्टडी में लोग 30 में से औसतन 4.3 दिन बात की। भारत में पूरी हुई ऐसी कोई स्टडी नहीं मिली। ज़्यादातर ट्रायल ने नुकसान के इवेंट पहले से तय नहीं किए। Conclusions. लक्षण के स्केल की जगह तबीयत पर नापें तो AI बातचीत एजेंट का फायदा छोटा और अनिश्चित है। वेट-लिस्ट के सामने फायदा दिखता है। अच्छे डिजिटल रिसोर्स के सामने नहीं दिखता। स्किल और आदत कम नापी गई। भारत के ऑफ़िस का सबूत अभी है ही नहीं। Registration. यह रिव्यू पहले से रजिस्टर नहीं हुआ।

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