रिसर्च पेपर · RP09
0.19 का असर: शुक्र की लिस्ट रोज़ लिखें या हफ़्ते में एक बार?
ल्यूबोमिर्स्की की बात बीस साल से चल रही है। हफ़्ते में एक बार रोज़ से बेहतर। इस बात का पूल कभी नहीं बना। शुक्र की प्रैक्टिस का पूल असर छोटा है। Hedges g = 0.19 (95% CI 0.15 to 0.22)। यह सबसे बड़ी प्री-रजिस्टर्ड समीक्षा से है। k = 145 पेपर। N = 24,804। 28 देश। लिस्ट वाला तरीक़ा थोड़ा कम बैठता है। g = 0.17। हमने एक छोटी बात पूछी। क्या हफ़्ते में एक बार लिखना रोज़ लिखने से बड़ा या टिकाऊ फायदा देता है? खोज 2003 से 22 September 2026 तक चली। स्रोत: PubMed, PsycINFO, Scopus, Web of Science, Google Scholar, CTRI, ClinicalTrials.gov, OSF। सिर्फ़ वही स्टडी ली गईं जिनमें खुराक साफ़ लिखी थी। अंदाज़ा नहीं लगाया। मुख्य नतीजा: वेल-बीइंग और पॉज़िटिव अफ़ेक्ट। दूसरा नतीजा: उदासी के लक्षण। बारह लिस्टिंग स्टडी ने खुराक साफ़ बताई। वयस्क नियम पूरे हुए। रोज़ बनाम हफ़्ता वाली छपी RCT शून्य हैं। मशहूर लाइन ग़लत है। असल स्टडी ने हफ़्ते में एक बार को हफ़्ते में तीन बार से जोड़ा था। रोज़ से नहीं। और वह स्टडी अलग रिजल्ट पेपर बनकर नहीं छपी। Davis 2016 ने दिनों की गिनती जाँची। असर नहीं बढ़ा। p = .233। रोज़ की लिस्ट से पॉज़िटिव अफ़ेक्ट में छोटा फायदा कुछ स्टडी में दिखा। आम d = 0.15 to 0.38, साधारण कंट्रोल के मुकाबले। शिकायत वाली लिस्ट के मुकाबले बड़ा। सबसे बड़ी लिस्ट स्टडी में असर नहीं मिला। N = 958। हफ़्ते की लिस्ट से जीवन-मूल्यांकन कुछ जगह बढ़ा। कुछ जगह शून्य। हफ़्ते में दो बार, चार हफ़्ते, हांग कांग अस्पताल स्टाफ़। उदासी d = −0.49। स्ट्रेस d = −0.95। तीन महीने बाद। असर हफ़्ता एक-दो में दिखता है। सात दिन से चौदह दिन करने से फायदा पक्का नहीं बढ़ता। हफ़्ते में तीन बार, तीन हफ़्ते। तीन महीने में फीका पड़ गया। लिस्ट बनाम कंट्रोल पर भरोसा मध्यम है। हफ़्ता रोज़ से बेहतर है, इस दावे पर भरोसा बहुत कम है। भारत की अच्छी वयस्क लिस्ट RCT नहीं मिली। भारतीय ऑफ़िस के लिए ईमानदार खुराक यह नहीं है कि रोज़ हमेशा लिखो। छोटी लिस्ट। भाषा अपनी। हफ़्ते में एक से तीन बार। बासी लगे तो रोक दो।