रिसर्च पेपर · RP42

0.18 असर, 80% लोग जुड़े रहे — मैसेज से इमोशनल फ़िटनेस

हेल्थ हैबिट के लिए मैसेज की स्टडी पहले हो चुकी है। इमोशनल फ़िटनेस (Emotional Fitness) के लिए अब तक पूल नहीं बना था। यह PRISMA-2020 रिव्यू है। सवाल सादा है। SMS, व्हाट्सऐप और जैसे चैनल क्या देते हैं। लोग कितने दिन जुड़े रहते हैं। दस RCT (ऐसी स्टडी जिसमें लोगों को लॉटरी की तरह दो ग्रुप में बांटा जाता है) मिलीं। साल 2012 से 2024। करीब 5,225 बड़े लोग। पूल किया Hedges g (असर कितना बड़ा है, इसका नाप) 0.18 निकला। 95% CI 0.08 से 0.27। फर्क स्टडी-स्टडी में काफी था। I² = 64%। τ² = 0.012। 95% prediction interval −0.10 से 0.46 चला। इसमें शून्य भी है। मतलब अगली स्टडी में असर न भी दिखे। सिर्फ वेलबीइंग नापने पर g = 0.10 रह गया। स्ट्रेस-डिस्ट्रेस पर g = 0.26 था। यह आंकड़ा दो छोटी क्लिनिक SMS पायलट से ऊपर उठा। वन-वे मैसेज और टू-वे चैट में साफ फर्क नहीं मिला। अमीर देशों और गरीब-मध्यम देशों का औसत करीब एक जैसा था। आंकड़े कम हैं। रिटेंशन ज्यादा साफ नंबर है। कोर्स के आखिर तक करीब 80% लोग जुड़े रहे। रोज़ या लगभग रोज़ वाला वन-वे मैसेज 85–93% लोगों को रोक पाया। टू-वे चैट बॉट पर यह 42% तक गिर गया। भारत में अब तक कोई पूरी हुई अडल्ट स्टडी नहीं मिली। जो SMS या व्हाट्सऐप से वेलबीइंग या स्ट्रेस प्रोग्राम चलाए। यकीन का स्तर: वेलबीइंग पर कम। स्ट्रेस-डिस्ट्रेस पर कम। वन-वे रिटेंशन पर मध्यम। जापान की एक LINE स्टडी में 1,021 कर्मचारी थे। नतीजा लगभग शून्य। यह शून्य भी औसत में है। छिपाने की चीज नहीं। मैसेज एक पहुंच का रास्ता है। जादू नहीं। लोग कमरे में रह जाते हैं। कमरे में क्या प्रैक्टिस करनी है, वह गिनकर बताना होगा। भारत में जांच भी करनी होगी।

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