रिसर्च पेपर · RP44
0.45 बनाम 0.18: बर्नआउट में ऑफ़िस जीता, स्किल पीछे
यह अपडेटेड सिस्टमैटिक रिव्यू एक सवाल पूछती है। नौकरी करने वाले वयस्कों में बर्नआउट कौन ज़्यादा घटाता है — इंसान की स्किल या कंपनी का बदलाव? दोनों साथ चलें तो असर जुड़ता है क्या? डॉक्टरों की नियंत्रित तुलना में कंपनी वाले प्रोग्राम ने बर्नआउट घटाया। Hedges g = 0.45 (असर कितना बड़ा है, इसका नाप)। 95% CI 0.28 से 0.62। इंसान वाले प्रोग्राम का g = 0.18 (95% CI 0.03 से 0.32)। यह आमने-सामने की तुलना 20 तुलनाओं से आई। डॉक्टर 1,550 थे। अब तक का सबसे साफ़ प्रकाशित फर्क यही है। कई धंधों में कंपनी और मिले-जुले प्रोग्राम ने थकान घटाई। g = 0.30 (95% CI 0.18 से 0.42)। स्टडी 13 थीं। उस पूल के दो मिले-जुले ट्रायल का g = 0.54 रहा। इंसान वाले प्रोग्राम ज़्यादा हैं। थकान ये लगभग g = 0.17 से 0.25 घटाते हैं। दूरी और भरोसा अक्सर जस का तस रहते हैं। साल 2025 की एक क्लस्टर-RCT 370 ICU में चली। देश 60 थे। RCT यानी ऐसी स्टडी जिसमें यूनिट को लॉटरी की तरह दो ग्रुप में बांटा जाता है। चार हफ्ते के अच्छे संवाद वाले प्रोग्राम के बाद बर्नआउट 52.2% रहा। सामान्य कामकाज वाले ग्रुप में 63.3% रहा। एडजस्टेड ऑड्स रेशियो 0.56। 2020 के बाद डिजिटल और कोचिंग ट्रायल बहुत बढ़े। भारत की कंपनी-स्तर की ट्रायल लगभग नहीं मिलीं। थकान पर छोटे इंसान-असर का यकीन मध्यम है। बड़े कंपनी-असर का यकीन कम है। मिले-जुले प्रोग्राम का यकीन बहुत कम है। भारतीय ऑफ़िस के लिए नारा नहीं है। गिनने लायक स्किल सिखाओ। काम बदलो। दोनों करो। सत्तर घंटे हफ्ते पर एक माइंडफुलनेस रेप अच्छा ब्रेक है। बुरी स्टीयरिंग है।