रिसर्च पेपर · RP39

मातृभाषा में कोचिंग: असर 0.28 बड़ा — भारत में ट्रायल शून्य

क्या मातृभाषा में दिया गया वेलबीइंग प्रोग्राम बेहतर चलता है? बीच-स्टडी तुलना कहती है हाँ। फ़ायदा करीब g = 0.28 है। Hedges g असर कितना बड़ा है, इसका नाप है। पाँच से कम ट्रायल एक ही प्रोग्राम को पहली और दूसरी भाषा में जोड़कर देखे। इसलिए नया पूल नहीं बन सकता। भारत के हेड-टू-हेड ट्रायल की संख्या शून्य है। यह PRISMA-2020 सिस्टमैटिक रिव्यू है। सवाल यह था। क्या बहुभाषी वयस्कों को मातृभाषा में दिया गया प्रोग्राम दूसरी भाषा से बेहतर है। सर्च PubMed, PsycINFO, Scopus, Web of Science, Google Scholar, CTRI, ClinicalTrials.gov और OSF पर चला। साल 2000 से 2026 तक। RCT ऐसी स्टडी है जिसमें लोगों को लॉटरी की तरह दो ग्रुप में बाँटा जाता है। ऐसा एक भी RCT नहीं मिला जिसने बहुभाषी वयस्कों में एक ही प्रोग्राम को L1 और L2 में बाँटा हो। सबसे अच्छे नंबर पुरानी मेटा-एनालिसिस के अंदर की भाषा-मैचिंग से आते हैं। Griner और Smith (2006) ने 76 स्टडी और 25,225 लोगों को जोड़ा। मातृभाषा वाले प्रोग्राम अंग्रेज़ी से दोगुना असरदार दिखे। d = 0.49 बनाम d = 0.21। Soto और साथियों (2018) ने 99 स्टडी अपडेट की। कुल d = 0.50। पब्लिकेशन बायस काटने के बाद 0.35। पसंदीदा भाषा और अनुवादित टेस्ट दोनों असर बढ़ाते दिखे। Hall और साथियों (2016) ने देखा। संस्कृति के हिसाब से बदला प्रोग्राम उसी के बिना-बदले रूप से बेहतर था। g = 0.52। भाषा खुद स्थिर मॉडरेटर नहीं बनी। दुभाषिया वाली तुलना मिली-जुली है। भारत के अच्छे प्रोग्राम स्थानीय भाषा में चले। Healthy Activity Programme, गोवा, उनमें है। किसी ने भाषा को लॉटरी से नहीं बाँटा। यह कहना कमज़ोर है कि मातृभाषा ही नतीजा बेहतर बनाती है। भारतीय ऑफ़िस के लिए बात सरल है। अंग्रेज़ी मातृभाषा सिर्फ़ 0.02 फ़ीसदी भारतीयों की है। ऑफ़िस लगभग सबकी अंग्रेज़ी में है। जब साफ़ प्रयोग नहीं है, भाषा मिलाना कम-पछतावे वाला फ़ैसला है।

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